December 14, 2017

उत्तर प्रदेश के समाजवादी महाभारत के पीछे की राजनीति

UP Election (Part 2)

पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश के राजपरिवार में घमासान छिड़ा है। जी हाँ, लोकतन्त्र में भी राजपरिवार। मुलायम सिंह यादव ने लोहिया के समाजवाद को परिवारवाद बना दिया। जब उनके सुपुत्र युवा अखिलेश यादव 2012 में मुख्यमंत्री बने, तो उन्होने एक कदम बढ़ कर समाजवाद को खुला यादव-वाद बना दिया।  लगभग पाँच सालों में यह यादव परिवार मिल बाँट के सत्ता का उपभोग कर रहा था। महत्वपूर्ण पदों पर यादव, मुसलमान या फिर परिवार के वफादार बैठाये गए। प्रदेश के युवाओं को लैपटाप का प्रलोभन दे कर सत्ता पाये अखिलेश ने अपने पिता के वोट-बैंक समीकरण मुस्लिम+यादव का ही अनुकरण किया। सरकारी योजनाएँ मुस्लिमो को दी गईं, तथा सरकारी नौकरियाँ यादवों को। सरकारी पुरस्कारों और समितियों पर इन्ही दो समुदायों के लोगों को ही प्राथमिकता दी गयी।

            मुलायम सिंह यादव के पिछले शासनकाल से भी आगे बढ़ कर सापाईयों को अपराध की खुली छूट दी गई। तथाकथित रूप से कद्दावर मंत्री आज़म खान के आदेशानुसार यूपी पुलिस को किसी भी मुस्लिम को किसी भी अपराध के लिए गिरफ्तार करने की मनाही थी। स्थिति बिगड़ने पर भी आज़म खान स्वयं पुलिसवालों को फोन कर कार्यवाही ना करने का सख्त निर्देश देते थे। जिसका विडियो पूरे देश ने देखा। इस खुले पक्षपात से ना केवल हत्या और बलात्कार जैसे अपराध बढ़े, बल्कि पिछले चार सालों में 300 से ज्यादा दंगे हुये, जिसमे सबसे बड़ा दंगा मुजफ्फरनगर का था। पूर्वी-उत्तर प्रदेश में तो कुछ मुस्लिम पुलिस अधिकारियों ने समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता कि तरह काम किया और हिंदुओं का जमकर शोषण किया। देवरिया में एसपी इमरान की वजह से स्थानीय हिंदुओं में आज भी दहशत है।

            काम के नाम पर भी पक्षपात और खूब लूट खसोट की गयी। प्रदेश लोकसेवा आयोग तो वस्तुतः यादव लोकसेवा आयोग बन गया। अवैध तरीके से एक यादव को अध्यक्ष बनाया गया। भर्ती परीक्षा में यादवों के लिए खुला पक्षपात किया गया, और जब न्यायालय ने अवैध अध्यक्ष को बाहर का रास्ता दिखाया तो एक अन्य यादव को अध्यक्ष बना कर इस पक्षपात को जारी रखा गया। पुलिस और अध्यापकों की नियुक्ति में भी जातिवाद, पैसा और पक्षपात देखने को मिला। यह पक्षपात सरकार के पोस्टिंग, ट्रान्सफर, निविदा, संविदा हर जगह व्याप्त रहा।

            इन सब ज़्यादतियों के बीच समाजवादी पार्टी का मीडिया मैनेजमेंट का कमाल ही था कि जंगलराज की यदा-कदा खबरें ही राष्ट्रीय स्तर पर आ पाती थी। इसके बावजूद जनता में व्यापक रोष है। प्रदेश के युवा अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं, महिलाओं का घर से निकालना दूभर हो गया है। सभ्य लोग अपराधियों के आतंक से आतंकित हैं। चार साल के कुकृत्यों से अखिलेश यादव अपने आपको अलग नहीं कर सकते हैं। इसी क्रम में अमर सिंह की वापसी हुई, जिससे अखिलेश के चचाजान शिवपाल मजबूत हुए। शिवपाल के मजबूत होते ही पूर्वाञ्चल के दुर्दांत माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय किया गया। मुख्तार की पार्टी पहले से ही सरकार में शामिल थी। अखिलेश के पास इस विलय का फौरी विरोध कर अपनी अपराधी-विरोधी छवि को बनाने का अच्छा मौका था। अतः इस महाभारत की पटकथा लिखी गयी। मुलायम सिंह ने सारे निर्णय सोच समझ के लिए। पिछली बार युवा के नाम पर जीते थे, अब अपराधी विरोधी छवि बनाने की कोशिश जारी है। क्योंकि यूपी की जनता किसी से त्रस्त है तो वो हैं अपराधी, जिनमे अधिकांशतः समाजवादी पार्टी के साथ है।

            यह संभव है कि बात इससे ना बने तो अखिलेश यादव नयी पार्टी बना लें, और नए स्वच्छ छवि पर चुनाव लड़े। यादव खानदान किसी भी कीमत पर सत्ता खोना नहीं चाहता है। 2014 के आम चुनावों कि दुर्दशा उन्हे आज भी याद है। लेकिन उनके लिए अपने कुकर्मों और पक्षपातों का पीछा छुड़ना भी इतना आसान नहीं है। मुलायम सिंह यादव इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि अगर यूपी में भाजपा कि सरकार एक बार बन गयी तो इस यादव राजपरिवार का सत्ता में वापस आना नामुमकिन हो जाएगा। हालाँकि भाजपा पूरी तरह से तैयार नहीं दिख रही ना ही प्रदेश में को मजबूत नेतृत्व है, लेकिन समाजवादी महाभारत की पटकथा उसे ही रोकने के लिए लिखी गयी है। यह कितना कारगर होगी, समय बताएगा।

~ अमित श्रीवास्तव

   स्वतंत्र विचारक

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Picture Credit Zee News – India

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Thinker-Executor, Participant-Observer, Philosopher-Practitioner, Interested in politics, culture and social research, columnist on Policy and Diplomacy. IIT Bombay and JNU alumnus.