December 13, 2017

गांधी, बोस ओर ड़ा अम्बेडकर

25 फरवरी सन् 1955 की वह शाम जब बीबीसी के दफ्तर मे संविधान  के निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेड़कर जी का साक्षात्कार चल रहा था ओर उस साक्षात्कार मे बाबा साहेब ने भारत के  इतिहास की  कुछ ऐसी अनकही बाते कही जिनको सुनकर  पूरा हिन्दुस्तान सकते मे था ऐसा क्या कहा था ड़ा साहब ने इन सब सवालो के जवाब जानने के लिए हमे इतिहास के उसी अध्याय पर जाना होगा जहा यह घटनाए  वास्तविक रूप से घटित हुई ।

मोहनदास करमचंद गांधी एक ऐसा नाम जो शायद किसी परिचय का मोहताज नही , जिन्हे हम लोग प्यार से बापू भी कहते है,उनके द्वारा चलाए विभिन्न आन्दोलनो ने अंग्रेजो को हिन्दुस्तान से निकालने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी परन्तु क्या अकेले गांधी जी वह कारण थे जिनके दम पर हमे आजादी मिली तो  शायद हम गलत है हालांकि गांधी जी की सोच थी कि सब लोग एक समान हो सभी को समान अधिकार मिले परन्तु इतिहास के कुछ पन्नो मे यह भी कहा गया कि   गांधी जी ने हर उस व्यक्ति को उठने नही दिया जिसने उनकी सोच के खिलाफ कार्य किया।

आजादी के इस आन्दोलन मे गांधी जी के अलावा कई ओर शख्सियत हुई जिन्होंने अपनी दृढइच्छाशक्ति के बल पर अंग्रेजो के नाक मे दम करके रखा,चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस ! 25 फरवरी के उस साक्षात्कार मे बाबा साहेब ने भी स्वीकार किया था कि  नेताजी सुभाष चंद्र बोस वह महत्वपूर्ण कारण थे जिसकी वजह से अंग्रेजों को सन् 1947 में भारत छोड़ना पड़ा था इसके तुरंत बाद ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट रिचर्ड एटली ने भी यह स्वीकार किया था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही मुख्य वजह थे।

नेताजी की  कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति फिर उन्हे अध्यक्ष पद से हटाकर पार्टी से निकालना कही न कही  गांधी ओर बोस के बीच की तल्खी को साफ जाहिर करता है जब भी बोस ने गोरो की सरकार के खिलाफ कुछ कारवाई करनी चाही तो क्यों गांधी हर बार बीच मे आए , ऐसा क्यों है कि 70 साल के बाद भी भारत के लोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में सच जानना चाहते हैं ? क्यों आज भी उनकी मौत एक रहस्य बनी हुई है ।

राजनीतिक कारणों से भारत की पिछली सरकारों ने स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी की भूमिका को मानने से इंकार किया ,वास्तविकता यह है कि  नेताजी अंग्रेजो को भारत छोड़ने के लिए छह महीने का अल्टीमेटम देना चाहते थे वही इसके विपरीत गाँधी जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी ने गोरी सरकार पर दबाव बनाने के लिए कोई ठोस कदम नही उठाए।

1939 मे कांग्रेस से निकाले जाने से पहले बोस ने बापू को एक बहुत बड़े पैमाने पर आन्दोलन करने की बात कही थी परन्तु बापू ने उसका विरोध किया था वही जब कुछ समय के बाद बोस को कांग्रेस से निकाल दिया तो वह जापान चले गए ओर वहा जाकर आजाद हिंद फौज की सेना मे शामिल हो गए

जब आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के मैदान में मोर्चा खोला उसी समय महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की गांधी के द्वारा सन् 1942 में शुरू किया गया यह आंदोलन बोस के सन् 1939 में प्रस्तावित  किए आंदोलन जैसा ही था परन्तु दुर्भाग्यवश तीन हफ्तो के अन्दर इस आन्दोलन को दबा दिया गया ओर लगभग एक महीने के अन्दर यह आन्दोलन पूरी तरह खत्म कर दिया गया इसलिए यह कहना कि भारत छोड़ो आंदोलन से देश को आजादी मिली ,कही से भी सही नही है तो फिर ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से देश को आजादी मिली।

सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिंद सेना ने अंग्रेजों का यह भ्रम तोड़ दिया था कि चाहे भारत मे कुछ भी हो जाए चाहे यहा के नेता कुछ भी कर ले सैनिको की वफादारी नही तोड़ सकते ,यह अंग्रेजी हुकुमत को एक बहुत बड़ा झटका था जिसके दम पर वह कई सालों से भारत पर राज कर रहे थे !अगस्त 1956 में अंबेडकर के देहांत के दो महीने के अंदर ही क्लीमेंट एटली ने कोलकाता गर्वनर हाउस पर आयोजित एक डिनर में तत्कालीन कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पी बी चक्रवर्ती के सामने यह बात स्वीकार कर ली थी।

जब जस्टिस चक्रवर्ती ने उनसे पूछा कि गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के कई वर्षों के पश्चात ऐसी क्या परिस्थितियां थी कि 1947 में आप लोगों को भारत छोड़ना पड़ा? एटली ने जवाब में कहा कि भारत की थल सेना और नौ सेना में अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ चल रही विद्रोह की भावना मुख्य कारण थी जिसे सुभाष चंद्र बोस के सैन्य कार्यकलापों ने जन्म दिया था। डिनर के अंत में जब जस्टिस चक्रवर्ती ने एटली से यह पूछा कि ब्रिटिश सरकार के भारत छोड़ने के निर्णय में गांधी का क्या प्रभाव था तो एटली ने ताना मारने के अंदाज में अपने होठों को सिकोड़ा और बोला था “ब-हु-त ही क-म”।

गांधी जी का दलितो ने हमेशा से विरोध किया  परन्तु सवाल उठता है यह विरोधाभास क्यू?  राजनीति में दलितों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए वर्ष 1932 में दलित नेता डॉ. बीआर अंबेडकर ने एक अलग प्रस्ताव रखा था. इसके तहत सीटों में आरक्षण के बजाय दलितों को अपना प्रतिनिधि ‘अलग से’ चुनकर (सेपरेट इलेक्टोरेट) भेजने की व्यवस्था सुझाई गई थी जिसे हरी झंडी भी मिल गई थी.लेकिन महात्मा गांधी ने इसका विरोध कर अनशन किया और आखिर उनकी बात मान ली गई. एस आनंद कहते हैं, “गांधी अगर विरोध ना करते और अम्बेडकर के प्रस्तावित रास्ते को अपना लिया जाता तो दो दशकों में एक मज़बूत और सच्चा दलित नेतृत्व उभरता जो दलित सरोकारों को आगे ले जाने में रुचि रखता. लेकिन आज की स्थिति में आरक्षित सीटों पर वही लोग चुने जा रहे हैं जिनके पास पर्याप्त संख्या है, अपने समुदाय को लेकर वचनबद्धता नहीं।

इन सभी तथ्यो से यह साफ हो जाता है कि इन तीनो की सोच समाज मे दबे ओर पिछड़ो को उभारने की थी,हाल ही मे  वर्तमान की केन्द्र सरकार के द्वारा नेताजी के दस्तावेजो को सार्वजनिक करने की घोषणा के बाद कांग्रेस ने उसका पुरजोर विरोध किया क्योंकि कांग्रेस नही चाहती कि दस्तावेज सार्वजनिक होने के बाद गांधी जी की जगह बोस को मिल जाए परन्तु इतिहास मे जो दर्जा गाँधी जी को प्राप्त है वह इन दोनो को नही जो कही न कही इतिहासकारो के शोध पर सवालिया निशान खड़ा करता है! इतिहास हमेशा से ही समय-सापेक्ष रहा है लेकिन उसकी समझ उस व्यक्ति से बनती है जो उसकी व्याख्या कर रहा है.यानी ये आप पर निर्भर है कि वर्तमान की परिपक्व समझ के लिए आप इतिहास के कितने अध्यायो को समझने की कोशिश करते हैं।

Picture Credit: World News


Disclaimer

About Sameer Chaudhary 12 Articles
MBA in HR. I worked for 3 yrs in financial Industry and finally decided to follow my dream which is writing. My passion is writing, exploring the world and to get different experiences by meeting people. My philosophy about life is that " You are the only master of life. So you decide what you want to do don't compel other to decide." Life is to live.....