December 14, 2017

हिन्दी और दिवस की औपचारिकता – एक निरीक्षण

          अभी-अभी हमने हिन्दी दिवस मनाया। कई अन्य दिवसों की तरह एक दिवस यह भी आया और गया। मंत्री-संतरी, बेबी-बाबा, ट्रेंडवीर-कार्यकर्ता आदि सबने सोशल मीडिया को ‘Hindi Diwas’ की बधाइयों से रंग डाला। कुछ राजनैतिक विचारक प्रकार के लोगों ने तो हद्द कर दी और हिन्दी दिवस को विशुद्ध अँग्रेजी में मनाया। सभी साहित्यकारों ने भी अपने अपने विचार रखे।

          हमेशा की तरह यह दिवस भी ‘हिन्दी के प्रति सौतेला व्यवहार’ वाली शिकायत का शिकार बना और बीत गया। सबका मन्तव्य इस हो हल्ला में अपने आप को संजीदा साबित करना था, किसी को हिन्दी भाषा के विकास से कुछ लेना देना नहीं। यह विडम्बना ही है कि विश्व की चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिन्दी, संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख भाषाओं में से एक नहीं है। संयुक्त राष्ट्र तो दूर की बात है, भारतीय प्रशासन में, भारतीय उच्च न्यायपालिका में हिन्दी के प्रयोग पर अघोषित पाबंदी है।

हिन्दी दिवस 14 सितम्बर को इसलिए मनाया जाता है कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। तब से आज तक हिन्दी दिवस तो मनाया जाता रहा है लेकिन हिन्दी राजभाषा तो दूर, द्वितीय भाषा भी नहीं बन सकी। अँग्रेज़ अपने आप को लाट साहब कहलवाते थे और हिन्दी जैसी भारतीय भाषाओं को बोलने वाले लोगों को गुलामों वाली हेय दृष्टि से देखते थे। भारतीय प्रशासन में यह प्रवृति आज भी देखी जा सकती है। भारतीय न्यायालयों – उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय – की तो बात ही अनोखी है, आप चाहें जितने भी भारतीय भाषाएँ जाने, आपको दलीलें अँग्रेजी में ही देनी होगी और आपको न्याय भी अँग्रेजी में ही मिलेगा।

          समाज के सबसे ख्याति प्राप्त लोगों हिन्दी फिल्मों के अभिनेताओं और राज नेताओं की तो रोजी-रोटी हिन्दी भाषा के बदौलत चल रही है। उनमें से केवल कुछ ने ही ‘हिन्दी दिवस’ की औचरिकता पूरी की, वास्तव में भाषा के लिए कुछ करना तो उनके लिए दूर की बात है। राजनेताओं और हिन्दी की बात आते ही लालू-मुलायम का झूठा हिन्दी प्रेम स्वाभाविक तरीके से याद आ जाता है। लालू ने अपने बच्चों को अँग्रेजी स्कूल में पढ़ाया और शासन का बेजा इस्तेमाल करते हुये एमबीबीएस का स्वर्ण पदक भी दिला दिया। मुलायम एक ओर जहाँ जनता को हिन्दी प्रेम दिखाते रहे वहीं अपने पुत्र अखिलेश को देहारादून के अँग्रेजी माध्यम के विद्यालय में पढ़ाया, बाद में ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने भेज दिया। हिन्दी प्रेम के नाम पर ऐसी दोहरी नीति कहीं और देखने को नहीं मिलेगी।

           फ़िल्मकारों और अभिनेताओं की बात तो और भी निराली है। ये लोग सम्मान, पैसा और सुविधाएं तो चाहते हैं लेकिन किसी भी प्रकार की सामाजिक या नैतिक जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहते हैं। आज तक अरबों-खरबों कमाने वाले हिन्दी फिल्म उद्योग ने हिन्दी साहित्य तो दूर, हिन्दी भाषा तक के लिए कुछ नहीं किया।

       अँग्रेजी किताबें पढ़ कर अपने आपको आधुनिक दिखाने का चलन छोटे शहरों में है तो महानगरों में लोग एक कदम आगे हैं। ये लोग तो अँग्रेजी में ही अमेरिकी और ब्रिटिश जुबानों का भोंडा प्रदर्शन भी करते हैं। इनके बीच कोई हिन्दी बोल दे तो उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। ऐसी मानसिकता की वजह से ही अँग्रेजी पुस्तकें तो खूब बिकती हैं लेकिन हिन्दी पुस्तकों के खरीददार तक नहीं मिलते।

          हिन्दी की बात करते समय कुछ ज्ञानी लोग यह दलील भी देते हैं कि आज के समय में अँग्रेजी जरूरी है। इनको शायद यह पता नहीं कि विश्व के सभी उन्नत देश अपनी मातृभाषा का प्रयोग कर के ही विकसित हुये हैं। कुछ लोग तकनीकी को आधार बना कर अँग्रेजी का गुलाम बने रहना चाहते हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि जापान, जर्मनी, रूस, फ़्रांस यहाँ तक कि चीन आदि देशों में आधुनिकतम तकनीकी तक भी स्थानीय भाषा में ही है। मैकाले की मानसिक गुलामी इतनी प्रभावी है कि मातृभाषा के प्रयोग से होने वाले प्रगति और आत्मसम्मान को ठुकरा कर एक आम भारतीय, आईटी-चाकर बनना ज्यादा सुविधाजनक समझता है। हमारी सरकारें और शिक्षा तंत्र भी यही चाहता है। भारत में उच्च शिक्षा मात्र अँग्रेजी माध्यम से ही संभव है, चाहे आप तकनीकी, विज्ञान या फिर सामाजिक विज्ञान में ही उच्च शिक्षा क्यों न लें।

          इन तमाम मानसिकताओं और विरोधाभासों बावजूद हिन्दी भाषा का आयाम तेजी से बढ़ा है। भला हो यूनिकोड का और कुछ प्रयासरत लोगों का। हिन्दी का प्रभाव अब इंटरनेट की आभासी दुनिया के माध्यम से लोगों तक पहुँच रहा है। इसमें जनसाधारण की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। आम लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से बेहतरीन सामाग्री, लेख व रोचक सूचनाएँ सबके लिए उपलब्ध कराये हैं। ट्वीटर और फ़ेसबूक पर तो क्षणिकाओं और व्यंग का तालमेल करते हुये ‘लोपक’, ‘ठप्रेक’ आदि नामों से लोगों ने अपनी अद्भुद रचनात्मकता का परिचय देते हुये बहुतायत हिन्दी सामाग्री का योगदान किया है। यही कारण है कि भारत के इंटरनेट की दुनिया में अंग्रेजी की तुलना में हिंदी सामग्री की मांग पांच गुना तेजी से बढ़ रही है। हम छोटे ही सही, मुट्ठी-भर ही सही, रामजी के गिलहरी की तरह अपना हर संभव सहयोग देना ही होगा। सोशल मीडिया में हिन्दी में लिखें, विकिपीडिया के हिन्दी भंडार में सहयोग करें। हिन्दी बोलने में गर्व का अनुभव करिए।

Picture Credit:  www.hindikiduniya.com


          ~ अमित श्रीवास्तव

          स्वतंत्र विचारक।

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Thinker-Executor, Participant-Observer, Philosopher-Practitioner, Interested in politics, culture and social research, columnist on Policy and Diplomacy. IIT Bombay and JNU alumnus.