March 24, 2017

चरणचिह्न

Bhairavi Ashar

एक विनम्र प्रयास – 
कवि श्री ‘सुन्दरम् ‘ द्वारा सन १९५८ में  रचित गुजराती कविता ‘चरणचिह्न’ का भावानुवाद
charanchinah
रूप का मैं रसिक तो रहा पर तृषा मेरी अरूप के लिए
भज रहा मैं अविरत मूर्त है जो कभी मिले अमूर्त इसलिए
शब्दों को पुकार पुकार मैं नित्य ढूंढ रहा अशब्द ही
सदा चलता रहता मिल जाये कदा मुझे स्थिरता कहीं
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रे आओ आओ मुझ पास ऐ उस पार के निवासी
धन्य हो वो एक पल बस तेरी मिल जाए हे प्रवासी
सिमटी रहे भले सकल तेरी कला, मेरी बस याचना
एक दृष्टि तेरी मुझ ओर हो जाए, यही है प्रार्थना
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यह जीवन-मृत्यु की इस जग में बनी सुन्दर फुलवारी
यहाँ पुष्प और कंटक के द्वंद्व की नित्य अद्भुत यारी
यहाँ पृथ्वी पर देवों का अमृत घट कभी दिखा ना
ना ही यहाँ देखी कभी स्वर्गपुष्प की चिरंजीव माला
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मैं तो रात रात भर तारे अगिनत देखता जागूँ
बस इस बेला में चरणचिह्न ही तेरे मैं मांगूँ
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(मूल कविता ‘सुन्दरम्’ के काव्यसंग्रह प्रियंका से)
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About Author – Bhairavi Ashar has interests in languages, education, child psychology, economics, politics, philosophy, culture, nutrition, yoga, spirituality and religions. A student of CA before being a proud full-time mother, she is now a remedial teacher for students with Learning Disabilities. A lifelong learner, she likes to share her reflections on life and the world around in form of poetry and prose at bhairaviparag.blogspot.in

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Featured Pic Courtesy – www.icytales.com
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