September 20, 2017

Toilet ek Prem Katha – Review

फिल्मों के ज़रिये समाज को सन्देश दिए जाने को मैं सिनेमा का मुख्य उद्देश्य नहीं मानता लेकिन मनोरंजन के साथ कोई फिल्म इतना बड़ा और जरुरी सन्देश देती है तो ये अद्भुद है, और ये फिल्म मुख्यधारा की होती हुई भी बहुत अलग हो जाती है।

वायाकॉम 18 मोशन पिक्चर के बैनर तले बनी इस फिल्म के पूर्वार्द्ध में रोमांस अपने चरम पर है और ठहाके लगभग हर सीन पर लगते हैं, बाद के कई भावनात्मक दृश्यों में भूमि पेडनेकर और अक्षय दिल को छू लेते हैं , केशव (अक्षय) के पिता के रोल में सुधीर पांडे हैं है जो खुद तो घर के बाहर ही मूत्रत्याग करते हैं मगर घर में शौचालय बनवाने को धर्म और संस्कृति का अपमान मानते हैं , सभी कलाकार अपने रोल में फिट हैं लेकिन फिल्म का कथानक और मुख्य रूप से संवाद इस फिल्म की जान हैं, सिद्धार्थ और गरिमा ने इस फिल्म के संवाद, कथानक, गीत सबकुछ लिखे हैं  और शायद इस साल के लिए संवाद लेखन का पुरस्कार ले भी जाएँ ।

आज भी इस देश को टॉयलेट बनवाने और उसका इस्तेमाल करने के लिए प्रधानमन्त्री तक को अभियान चलाना पड़ रहा है और वो क्यों सफल होने में वक्त ले रहा है ये फिल्म देखकर आपको पता चलेगा , हर सीन में महिलाओं को लोटा और लालटेन के साथ खेतों में जाते , साडी उठाकर बैठते और उन महिलाओं द्वारा स्वतः ऐसी परेशनियों का हंसी मज़ाक करते भी दिखाया गया है यहां पर तारीफ़ करनी होगी निर्देशक श्री नारायण सिंह की जिन्होंने हिंदी फिल्मों के परंपरागत मसाले को ही इस्तेमाल करते हुए ऐसे निर्देशन किया है की महिलाओं के शौच जाने के ऐसे विषय पर कोई सीन न तो भद्दा लगा है न ही अपमान जनक महसूस हुआ है ।

फिल्म की कहानी क्या बताएं इसकी कहानी ट्रेलर में ही देख ली होगी आपने  बाकी कुछ सीन कलात्मक संकल्पना की मिसाल हैं जैसे अक्षय का रोज अपनी पत्नी को स्टेशन ले जाकर ट्रेन में टॉयलेट इस्तेमाल करवा कर घर लाना और एक दिन भूमि का टॉयलेट में बंद हो जाना और ट्रेन स्टेशन से छूट जाना, मोबाइल टॉयलेट चोरी करके घर लाना इत्यादि ।

फिल्म के आखिर में नेताओं के कुछ दृश्य नाटकीय लगे हैं लेकिन फिर कहूंगा संवादों ने संभाल लिया है, अक्षय के भाई के रोल में दिव्येन्दु  के हिस्से द्विअर्थी और बहुत बढ़िया बढ़िया संवाद आये हैं और उनपर जोरदार ठहाके की गूँज थिएटर हिला देगी , भूमि पेडनेकर की आने वाली फिल्म शुभ मंगल सावधान के पहले ही ये फिल्म उनके कैरियर के लिए शुभ संकेत है , हालांकि भावनात्मक दृश्यों में अक्षय बाजी मार ले गए हैं , अक्षय के पिता के रूप में सुधीर पांडे अपने अंदाज में और मुखर होकर भावभंगिमा दिखाते हैं ।

फिल्म के संवाद बहुत सधे हुए और फिल्म को रंगत देते हुए चलते हैं उदाहरण के तौर पर फिल्म के एक सीन में यूपी के मुख्यमंत्री टॉयलेट घोटाले में लिप्त अधिकारियों के ऑफिस के टॉयलेट में ताला लगवाते हुए कहते हैं

” जब प्रधान मंत्री देश के लिए नोटबंदी करवा सकते हैं तो हम शौचालय बंदी क्यों नहीं करवा सकते” 
या कोर्ट में अक्षय भूमि से कहते हैं
“इतने लोग तो हमारी शादी में ना आये जितने तलाक में आ गए “

मथुरा या उसके आसपास की भाषा और उस क्षेत्र में मनाई जानेवाली लट्ठमार होली का फिल्मांकन अपेक्षा के अनुरूप ही हुआ है । सोनू और श्रेया की आवाज में संगीतकार विक्की प्रसाद का गाना  “हंस मत पगली” काफी बढ़िया लगता है बाकी गाने भी ठीकठाक हैं । फिल्म इस समाज से सवाल करती है और उस सवाल से हम सब मुह नहीं फेर सकते  , जाइये बिंदास देख आइये 5 में से साढ़े तीन स्टार देता हूँ । बाकी महिलाओं का शौच की जगह के लिए जूझना जारी रहेगा उसे इतनी जल्दी कोई बदलने वाला नहीं । राधे राधे

लेखक – हरिओम त्रिपाठी

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Picture Credit: Wikipedia


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