May 23, 2017

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों का समसामयिक विश्लेषण

कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता उत्तरप्रदेश से हो कर जाता है। केंद्र में भाजपा सरकार का पूर्ण बहुमत यूपी में जबर्दस्त समर्थन से ही हासिल हुआ। वर्तमान में भी उप्र के विधानसभा चुनाव देश की राजनीति की दिशा तय करेंगे। राज्यसभा की राजनैतिक स्थिति बहुत हद तक इसी विधानसभा से तय होगी। उप्र में जीतने पर भाजपा की स्थिति राज्यसभा में मजबूत होगी। अन्य राज्यों के मुक़ाबले उप्र के चुनाव नोटबंदी सहित कई महत्वपूर्ण फैसलों पर जनता की प्रतिक्रिया को भी निर्धारित करेंगे। इसप्रकार ये चुनाव केंद्र सरकार के भविष्य में लेने जाने वाले फैसलों को प्रभावित करेंगे। चूंकि 2019 में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं; अतः उप्र के चुनाव, केंद्र सरकार के लिए सेमी-फ़ाइनल जैसे हैं।

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मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाजवादी पार्टी ने सबसे पहले अपना दांव चला। बसपा की रणनीति दलितों और मुस्लिमों के वोट से सहारे सरकार बनाने की है। दलितों और ब्राह्मणों के साथ मायावती एक बार सरकार बना चुकीं हैं। लेकिन तब से आजतक लखनऊ की गोमती में बहुत पानी बह चुका है। आज के तारीख में जातिवाद को सोशल-इंजीनिरिंग के नाम का लेबल लगा कर बेचना थोड़ा कठिन है। भले ही मशरूम की तरह उगे जाति महासभाओं ने मायावती को समर्थन दिया हो, आम जनता मायावती के जातिवादी तरीके को देख चुकी है। इस चुनाव में मायावती ने मुस्लिम कार्ड कुछ ज्यादा ही खेल दिया है। अमूमन बसपा की रैलियों में कुरान की कसमें दिलाना पहले से ही सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील उप्र में अपने जाति सहित सभी हिंदुओं को सावधान कर दिया है।

2016 के पूर्वार्ध से ही सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी चुनावी मुद्रा में आ गयी थी। फटाफट साइकल-ट्रैक जैसी ऊटपटाँग योजनाएँ पास कर पैसों का इंतज़ाम किया जाने लगा। मुलायम सिंह यादव अपने पुराने फ़ॉर्म में वापस आ गए थे और कारसेवकों पर गोली चलवाने का श्रेय बार-बार ख़ुद को दे कर मुस्लिमों को समाजवादी पार्टी के तरफ़ करने के प्रयासों में लग गए थे। मायावती भी मुसलमानों को सबसे ज़्यादा सीटें दे कर कुछ वैसा ही कर रहीं थी।

इसी बीच उरी आतंकी हमला हुआ और उसके बाद पाक अधिकृत कश्मीर के अंदर सर्जिकल स्ट्राइक किया गया। इससे मुलायम और मायावती के किए कराए पर पानी फिर गया। शहीद सैनिकों के परिवारों के प्रति अखिलेश सरकार की उपेक्षा को जनता देख चुकी थी। मोदी दुबारा लोकप्रिय होने लगे थे।

यह देख कर बाप-बेटे ने समाजवादी नाटक रच डाला। इस नाटक का उद्देश्य अपने कुकृत्यों को छुपा कर अखिलेश को एक नया मुखौटा पहनाना था। नाटक के ख़त्म होते ही काँग्रेस से गठबंधन कर मुस्लिम वोट को बिखरने से रोकना था। सब कुछ प्लान के मुताबिक़ चल ही रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी की घोषणा कर दी। नोटबंदी का जनता ने स्वागत किया, हालाँकि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को कठिनाइयाँ हुयीं। राजनीतिक दलों के तमाम सच्चे-झूठे वादों के बीच उप्र की अधिकतर आम जनता ने नोटबंदी का स्वागत किया।

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जब चुनाव की अधिसूचना जारी हुई, सपा-काँग्रेस का गठबंधन भी तैयार था। बिहार वाले फ़ॉर्म्युला को सेक्युलर लोग उप्र में भूनाना चाह रहे थे। जेएनयू से ले कर मीडिया तक एक ‘लोकतंत्र ख़तरे में है’ का तमाशा शुरू करने की कोशिश की गई किंतु लोगों के ध्यान न देने ये यह तमाशा शुरू होने के पहले ही ख़त्म हो गया। बिहार में जैसे लालू ने सामान्य/अनारक्षित जाति के लोगों को जम कर गालियाँ दी थी, वैसा उप्र में करना आत्मघाती था। यहाँ न केवल संख्या बल का फ़र्क़ है, बल्कि स्थानीय समीकरण भी अलग-अलग हैं। लिहाज़ा कोई सपा-बसपा का जातिवादी नेता लालू जैसी जुर्रत नहीं कर पाया। शुरुआती दौर में अखिलेश-राहुल गठबंधन को जो बढ़त थी, उसको इन लोगों ने मोदी को निशाना बना कर खो दिया।

सपा-बसपा-काँग्रेस के मुस्लिम प्रेम को देख कर बहुसंख्यक हिंदू वोटरों का भाजपा से उम्मीद रखना स्वाभाविक था। अमित शाह ने टिकट बँटवारे में इस बात का पूरा ध्यान रखा। हालाँकि लगभग 40 सीटें बाहरी लोगों के देने से भाजपा के पुराने कार्यकर्ता खासे नाराज़ थे। भाजपा द्वारा एक व्यक्ति को नेतृत्व न देना भी एक कारण था कि कई स्थानीय मामलों में अखिलेश सरकार को निशाने पर लेने वाला कोई नहीं था। बाहर से आए सांसदों का पिछले ढाई सालों में पार्टी के प्रति और जनता के प्रति उदासीन रहने की वजह से लोगों में ख़ासी नाराजगी थी। इन सब कारणों से भाजपा की स्थिति शुरुआती दौर में ठीक नहीं लग रही थी।

इसबीच, सपा-काँग्रेस गठबंधन ने अखिलेश के शासनकाल को दो भागों में बाँट कर बाद वाले भाग को केवल अखिलेश का बता कर जनता को भरमाने का भरसक कोशिश किया। सनद रहे कि मोहनलालगंज की सामूहिक बलात्कार और वीभत्स हत्या, बुलन्दशहर हाइवे का बलात्कार, कानपुर में ऐम्ब्युलन्स के अभाव में पिता द्वारा बच्चे के शव को ले कर दर-दर भटकना आदि सारे प्रकरण अखिलेश के स्वयं वाले बाद के दो सालों में ही हुए थे। जागरूक लोग ख़ासकर युवा वर्ग इन घटनाओं को भुला नहीं है। आज यूपी का युवा किसी का बंधुआ नहीं है।

यूपी में इस बार के विधानसभा चुनावों के घटनाक्रम बहुत तेजी से बदल रहा है। भाजपा द्वारा कोई मुख्यमंत्री चेहरा न देना, जाट-आंदोलन और चुनाव अभियान में देरी से लग रहा था की पहले चरण में भाजपा को नुकसान हो सकता है। लेकिन पहले चरण के मतदान के बाद भाजपा की स्थिति मजबूत लग रही है। संभवतः अंतिम समय में जाट व अन्य समुदायों ने भाजपा को वोट देने का निर्णय लिया। अजित सिंह के सक्रिय होने से सपा-काँग्रेस गठबंधन और बसपा को पहले चरण में कम ही सीटें मिलने वाली हैं। दूसरे चरण में भी यही चलन जारी रहने की उम्मीद है, हालाँकि इस चरण में भाजपा और सपा में टक्कर का मुक़ाबला होने वाला है। शहरी क्षेत्रों में मतदान का कम होना व्यापारी-सराफ़ वर्ग में भाजपा के प्रति रोष को दिखाता है।

मध्य उत्तर प्रदेश में सपा-काँग्रेस की स्थिति थोड़ी मजबूत दिख रही है। अतः तीसरे, चौथे और पांचवे चरण काफी निर्णायक रहेंगे। बार बार हो रहे दंगों और सपा सरकार की उदासीनता से पूर्वी उत्तर प्रदेश में लोगों में समाजवादी पार्टी के प्रति काफी रोष है। योगी आदित्यनाथ की सक्रियता की वजह से पूर्वाञ्चल में भाजपा की स्थिति मजबूत है। अगर 11 मार्च तक कोई बड़ी घटना नहीं होती है या फिर कुछ अचानक नहीं होता है, तो इस आम चुनाव में उप्र में भाजपा की सरकार बनती तय लग रही है। बसपा और सपा-गठबंधन बराबर के विपक्षी होंगे। परिणाम चाहें जो भी हों, 2014 की तरह ही उत्तर पदेश के परिणाम देश के राजनैतिक दिशा और दशा को तय करने वाले होंगे।


~ Amit Srivastava

Free thinker and Independent Researcher

Twitter: @AmiSri


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Thinker-Executor, Participant-Observer, Philosopher-Practitioner, Interested in politics, culture and social research, columnist on Policy and Diplomacy. IIT Bombay and JNU alumnus.